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बेटियाँ

इंजी. वीरबल सिंह "वीर"       18-09-27

बेटियाँ"

क्यूँ महफूज़ नहीं हैं बेटियाँ, मेरे भारत देश में ।

जुर्म ढा रहे हैं अपने ही , अपनत्व के भेष में ।।

 

जैसे तैसे बची गर्भ से लाढ़ो, सड़कों पर लूटा है।

दुर्भाग्य हमारे हाथों में या ,भाग्य उसी का फूटा है ।।

 

चल रहे भेड़िये राहों में ,उन्होंने मुट्ठी में भींचा है ।

मसलें सुकुमार कली को,जिसे माँ-बाप ने सींचा है ।।

 

गैरों पर विश्वास बहुत है, मगर अपनों से धोखा है।

क्यों बेटियों को आज भी,आज़ादी से हमने रोका है ।।

 

जिसके जाये हैं हम ,उसी पर कर रहे हैं अत्याचार।

अबला नहीं वो सबला है अब,श्रष्टि का है आधार ।।

इंजी. वीरबल सिंह "वीर"