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क्या है ग्लोबल वार्मिंग...

शैलेश सिंह कुशवाह ग्वालियर म.प्र.       18-11-06

क्या है ग्लोबल वार्मिंग...

 

पृथ्वी की सतह सूर्य की किरणों से ऊष्मा प्राप्त करती है। सूर्य की किरणें वायुमंडल से गुजरते हुए पृथ्वी की सतह से टकराती हैं। पृथ्वी की सतह से टकराने के बाद किरणें परिवर्तित होकर वापस लौट जाती हैं। पृथ्वी का वायुमंडल कई प्रकार की गैसों से मिलकर बना है जिनमें मिथेन और ग्रीन हाउस गैस भी शामिल हैं। ये गैसें पृथ्वी के ऊपर प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं। यह आवरण वापस लौटती सूर्य की किरणों के एक हिस्से को रोक लेती है और पृथ्वी के वातावरण को गर्म बनाये रखता है। यह आवरण कम्बल की तरह काम करता है और ब्रह्मांड की सर्दी को पृथ्वी तक पहुंचने नही देता। परंतु ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ने पर यह आवरण और अधिक मोटा हो जाता है। यह मोटा आवरण सूर्य की और अधिक किरणों को रेफलेक्ट होने से रोकने लगता है और पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगता है। यही है ग्लोबल वार्मिंग...

चीन और अमेरिका विश्व की दो ऐसी महाशक्तियां हैं जो वातावरण को सबसे ज्यादा प्रदूषित कर रही हैं। प्रदूषण फैलाने के मामले में चीन सबसे आगे हैं। वह अमेरिका को भी पीछे छोड़ गया है। पिछले कोई एक दशक में जिस रफ्तार से चीन की अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है, उसी रफ्तार से वहां प्रदूषण भी बढ़ता गया है। पृथ्वी में जितना कार्बन (कोयले का धुआं) उत्सर्जित हो रहा है, उसका 28 प्रतिशत अकेले चीन में हो रहा है। 14 प्रतिशत के साथ अमेरिका दूसरे व 7 प्रतिशत के साथ भारत तीसरे स्थान पर है। इसी प्रदूषण के कारण पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है जिसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।

 

मुख्य कारण...

हाल ही में ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरों पर ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लीसेस्टर ने एक स्टडी की है। जिसके मुताबिक समुद्र के तापमान में कुछ और डिग्री की बढ़ोतरी हुई तो ऑक्सीजन की मात्रा कम हो सकती है। जिसमें बड़ी तादाद में इंसानों और जानवरों की मौत की आशंका है। ग्लोबल वॉर्मिंग पर अंकुश लगाने के लिये समय रहते कुछ नहीं किया गया तो सन 2100 तक समुद्र का तापमान करीब 6 डिग्री सेल्सियस तक और बढ़ जायेगा। जिससे ऑक्सीजन का उत्सर्जन बंद होने का डर है। हाल ही में चेन्नई समेत तमिलनाडू के कई इलाकों में हुई भारी बारिश और बाढ़ को भी बदलते जलवायु का नतीजा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में दुनिया के कई हिस्सों में यह आम बात हो जायेगी। लीसेस्टर के वैज्ञानिक कहते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से बचने का एक ही तरीका है जलवायु परिवर्तन के लिये जिम्मेदार कारणों पर अंकुश लगाया जाये।

ये भी अहम कारण: ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन है। जीवाश्म ईंधन यानी कोयला, तेल व प्राकृतिक गैस। कार्बन डायआक्साइड : ऊर्जा की असीमित मांग को पूरा करने के लिए असीमित मात्रा में जीवाश्म ईंधन जलाया जा रहा है जिससे वातावरण में कार्बन डायआक्साइड (सीओ2) की मात्रा बढ़ रही है। कोयला जलने से कार्बन डायआक्साइड वातावरण में फैल रही है। सबसे ज्यादा प्रदूषण कोयला फैला रहा है। विश्वभर में 40 प्रतिशत बिजली कोयले से उत्पादित होती है। ताप विद्युत घरों में प्रयुक्त होने वाले कोयले से 37 प्रतिशत कार्बन डायआक्साइड उत्सर्जित हो रही है जो तापमान को बढ़ा रही है। कारों, ट्रकों व यातायात के अन्य साधनों में प्रयुक्त होने वाला ईंधन तेल भी कार्बनडायआक्साइड उत्सर्जन में सहायक होता है।

 

जंगलों का कटान : जंगलों के अंधाधुंध कटान के कारण बारिश कम हो रही है। पेड़ हवा को स्वच्छ रखने में फिल्टर का काम करते हैं।

 

>> जल-वाष्प : कार्बन डायआक्साइड के उत्सर्जन से तापमान बढ़ने के कारण वातावरण में जल-वाष्प की मात्रा बढ़ रही है। जलवाष्प की मात्रा बढ़ने के कारण बेमौसमी बारिश होती है जिससे बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ता है।

 

>> खनन : तेल, कोयला व अन्य खनिजों के खनन के समय मिथेन गैस उड़ जाती है। इससे मिट्टी की उर्वरता भी कम हो जाती है।

 

 क्या है हल...

वातावरण में कार्बन डायआक्साइड का उत्सर्जन न हो, इसके लिए जरूरी है विश्वभर में सौर और पवन ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो। सूर्य की किरणें और हवा ऊर्जा के प्राकृतिक व अक्षय स्रोत हैं। यूरोप, जर्मनी, इटली व स्पेन में जहां सोलर एनर्जी (सौर ऊर्जा) का अधिकाधिक उपयोग हो रहा है, वहीं अमेरिका में पवन ऊर्जा का प्रचलन बढ़ रहा है। विकसित देशों को इस दिशा में और भी ज्यादा पहल करनी होगी। उधर चीन ने भी 6 वर्ष पहले कोपेनहेगन में आयोजित जलवायु सम्मेलन के बाद अपनी सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा व जल विद्युत परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर पैसा लगाया है। परंतु चीन तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है इसलिए वहां कोयले की खपत और बढ़ेगी।

भारत ने भी अब सौर ऊर्जा को अपनाने का मन बनाया है। परंतु भारत एक विकासशील देश है। उसे अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार लाना है। इसके लिए नये कारखाने व उद्योग लगाने होंगे। उद्योगों को बिजली चाहिए। इसलिए अगले 15 साल में देश में कोयले की खपत तीन गुणा बढ़ने के आसार हैं। यानी भारत में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम होने की बजाय बढ़ेगा ही। परंतु 2030 तक उसने कार्बन उत्सर्जन करीब 30 प्रतिशत कम करने की योजना बनायी है।

 

ग्लोबल वार्मिंग का असर...

 

* उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों में बर्फ पिघल रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दक्षिणी अंटार्कटिका व ग्रीनलैंड में बर्फ की चादरें पिघल रही हैं। आर्कटिक समुद्र की बर्फ पिघल रही है।

* अंटार्कटिका में गुविन पक्षियों की संख्या लगातार घट रही है।

* समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इससे समुद्र के किनारे की बस्तियां उजड़ जायेंगी।

* तितलियों की कुछ किस्में, लोमड़ियां व अल्पाइन के पौधे ऊंचाई वाले ठंडे इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं।

* अतिवृष्टि व बेमौसमी बारिश होगी, जैसा कि हाल ही में चेन्नई में हुआ।

* तूफान तीव्र होने लगेंगे।

* बाढ़ और सूखा आम बात हो जायेगी।

* ताजे पानी की उपलब्धता कम होने लगेगी।

* मच्छर बढ़ेंगे तो डेंगू व मलेरिया जैसी बीमारियां बढ़ेंगी।

* इको सिस्टम बदल जायेगा। बर्फ पिघलने से जीव-जंतुओं की कुछ प्रजातियां तुप्त हो जाएंगी। ध्रुवों में बर्फ पिघल रही है। खाने को मछलियां नहीं मिलेंगी तो ध्रुवीय भालुओं का जीवन खतरे में पड़ जायेगा।