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अमृत पुंज

शशि कांत श्रीवास्तव डेराबस्सी मोहा       18-11-21

शरद चांदनी -बरस रही है 

इस वसुधा पर --नभ से 

वन -उपवन में छा गई खुमारी -और 

हवाओं में भी --मादकता 

मिल उपवन के पुष्पों संग 

सरिता के बहते जल को --देखो 

ऐसा लगता हो मानो -नीर नहीं 

पियूष चांदनी बह रही हो उसमें 

शरद चांदनी -बरस रही है 

इस वसुधा पर --नभ से 

पेड़ों के पत्तों से छन कर 

आती हुई ये चंद्र किरणें 

मानो -ऐसी लगती हों जैसे 

स्वर्ग उतर आया हो -धरा पर 

आओ चलें --प्रिये, उपवन में 

इस पल को जी लें --जी भर के 

शरद चांदनी -बरस रही है 

इस वसुधा पर --नभ से 

अंतिम प्रहर रात्रि का आया 

चंद्र किरण, हो गई है मध्यम --और 

चाँद भी शिथिल हो चला है अब 

तारे भी गुम हो चले हैं अब 

बूंदे घनी हो गई हैं -शबनम की 

ऐसा लगता हो --मानों 

पूर्ण धरा ढ़क गई हो, इक 

श्वेत -श्याम -झिलमिल तारों से 

शरद चांदनी बरस चुकी है 

इस वसुधा पर नभ से..  ||