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चाँदनी

शशि कांत श्रीवास्तव डेराबस्सी मोहाली       18-12-14

चाँदनी आज भी छिटक रही है 

धरा पर.... 

तारे आज भी चमक रहें हैं 

गगन में पर 

उस दिन जब मिले थे 

तुम और हम--चाँदनी रात में 

छत पर --दोनों खूब हर्षित हुये 

और --उभर आई मुस्कान 

चेहरे पर एकटक 

देखते रहे वो एक -दूसरे को 

मौन सन्नाटा 

पसरा था, चारो ओर --सिर्फ 

आवाज आ रही थी तारों की-या 

उनके सांसों की.... 

चाँद भी देख रहा था 

उनके प्यार को एकटक--अविचल 

मानो वह भूल गया हो घूमना 

क्या नाम दूं--- इसको 

प्यार --पूजा या समर्पण 

तन्द्रा टूटी.... 

चिड़ियों के चहचहाने से 

चाँद तो कब का जा चुका था 

सूर्य की किरणें अवतरित हो रही थी 

दोनों चले गये, चुपचाप 

यह हमारा वहम था --या 

कुछ और क्योंकि 

आज उदास हैं --दोनों 

बहा रहे हैं अपने आंसू 

शबनम की बूंदों के रूप में 

चाँदनी आज भी छिटक रही है 

धरा पर --उस दिन की तरह |