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पितृयान से देवयान समीक्षक:

राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"शिक्षक एवम       18-07-30

पुस्तक समीक्षा
 
पितृयान से देवयान
समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"
 शिक्षक एवम साहित्यकार
 
   साहित्य संगम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवीर सिंह मन्त्र की प्रथम कृति "पितृयान से देवयान" का मुखावरण आकर्षक लगा। अरुणोदय की बेला में कल कल करती सरिता व झोंपड़ी का दृश्य प्राकृतिक सुंदरता बड़ी मनोरम लग रही है। लेखक के प्रकृति प्रेम की झलक कृति के आवरण चित्र से साफ द्रष्टिगत होती है।
   इस कृति का नामकरण बहुत अच्छा व गूढ़ रहस्य लिए हुए हैं। प्रथम पूज्य गणेश ने भी माता पिता के परिक्रमा कर ईश्वर को प्राप्त किया। पितृ की कृपा बिना देव दर्शन दुर्लभ है। कृति के नाम से यह उक्ति स्पष्ट है।पितृ सेवा माता की सेवा करना उनका सम्मान करना ही इस कृति का दिव्य संदेश दिया।
  लेखक ने छंदमुक्त रचना से लेकर घनाक्षरी में विभिन्न रचनाएँ लिखी। कृति की भाषा सरल सुबोध एवम बोधगम्य है। रचनाओं को खड़ी बोली में लिखा गया है। भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार,वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार वैदिक राष्ट्र मासिक पत्रिका के संपादक जी ने इस कृति की 54 रचनाओं का बखूबी संपादन किया। आचार्य जी ने श्रेष्ठ संपादन करते हुए प्रथम रचना मातृ देवो भवः से श्री गणेश किया।
   संकल्प कविता में लेखक ने राष्ट्रभाषा हिन्दी सेवी का कर्तव्य निभाते हुए लिखा"हमारी भाषा का सम्मान। वतन की उन्नति का अभिमान।।" विश्व का कोई भी देश हो उस देश की उन्नति तभी होती है जब वहां की भाषा में रोजमर्रा के सभी नागरिक कार्य करें। हिंदी को हम माँ की संज्ञा जरूर देते हैं लेकिन आंग्ल भाषा का मोह नहीं त्यागते।
   महाभारत रचना में आप लिखते हैं"सत्य अभिमन्यु हुआ है झूँठ हुआ चक्रव्यूह।
कौरवों की भृष्ट सेना ने घेर रखी निरीह रूह।।
  वर्तमान में व्यक्ति सत्य खोजते खोजते थक जाता है। हर जगह झूँठ का बोलबाला है। 
  मानवता कविता में गिरते मानवीय मूल्यों की चिंता लेखक को सता रही है वे लिखते हैं"अब छल से ईमान डोल रहा है। प्रपंच सिर चढ़ कर बोल रहा है।।
   दायित्व रचना में आप लिखते हैं"दायित्वों का मोल नहीं मनमर्जी सरकार है। सियासत की वर्तमान दशा आंखों देखी आपने लिखने का प्रयास किया है। स्वामी श्रद्धानन्द बलिदान दिवस में कोमी एकता की ये पंक्तियां दिल को छू गई" जामा मस्जिद में वेद मन्त्र जिस साहस से उदघोष किया। भारतवासी सब एक बने ऐसा अदभुत था जोश दिया।
  सम्पादकीय में आचार्य जी ने लिखा "सृजन साहित्य की अनमोल उपलब्धि है।" यथार्थ में एक रचनाकार की वास्तविक पूंजी उसके द्वारा किया गया श्रेष्ठ साहित्य सृजन ही है जो लोक कल्याण की भावना से लिखा गया हो। चरैवेति में कविराज तरुण सक्षम ने सबका साथ सबका विश्वास सबका विकास की परंपरा को राजवीर सिंह मन्त्र द्वारा उत्तरोत्तर आगे बढ़ाने की प्रशंसा की।
   इस कृति की प्रमुख रचनाएँ कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित अजन्मी बेटी,कांटे,आर्यावर्त, नवयुग,इतिहास,सूर्योदय,सुप्रभात, दायित्व,मानवता,संकल्प,आतंक,प्रदूषण,स्वच्छता,आशा,स्वार्थ,परमार्थ,किसान, शिक्षक दिवस,नई शिक्षा नीति,महाभारत, वन्दे मातरम, आदि विषयों पर आपने पैनी लेखनी चलाई है। सहज,सरल सौन्दर्यबोध कराती सभी रचनाएँ कृति की रोचकता में वृद्धि करती है। 
  आचार्य जी के श्रेष्ठ सम्पादन में 54 रचनाएँ लेखक ने भारतीय संस्कृति,संस्कार,समाज,माता ,पिता,आचार्य अतिथि का सम्मान की प्रेरणा देती  कृति साहित्य जगत में स्वागत योग्य है। 
 
पुस्तक:- पितृयान से देवयान
कवि:- राजवीर सिंह मन्त्र
पेज:- 64
मूल्य:- 100 रुपये
प्रकाशक:- साहित्य संगम संस्थान प्रकाशन,इंदौर मध्यप्रदेश