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फादर्स डे पर विशेष: पिता पर ये हैं 5 बड़ी कविताएं...


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Posted By : Ram swaroop rajak    2018-06-17  

रविवार 17 जून को फादर्स डे मनाया जाएगा। पिता जीवन का एहसास है जो आपको जीने की शक्ति देता है। अपने विवेक से आपकी सोच को तैयार करता है। जब आप गलत रास्ते पर चलते हैं तो आपको सही कदम की ओर आगे बढ़ाता है।पिता के हाथों की ऊंगली आपको बचपन में खड़े होकर चलने में मददगार होती है। जीवन के अनन्य सहयोगी पिता को हम फादर्स डे पर याद करेंगे। इस अवसर पर हम पिता पर हिंदी के 5 बड़े कवियों की 5 कविताएं पेश कर रहे हैं। फिर पुराने नीम के नीचे खड़ा हूं फिर पिता की याद आई है मुझे नीम सी यादें ह्रदय में चुप समेटे चारपाई डाल आंगन बीच लेटे सोचते हैं हित सदा उनके घरों का दूर है जो एक बेटी चार बेटे फिर कोई रख हाथ कांधे पर कहीं यह पूछता है- क्यूं अकेला हूं भरी इस भीड़ में मैं रो पड़ा हूं फिर पिता की याद आई है मुझे फिर पुराने नीम के नीचे खड़ा हूं-कुमार विश्वास दिवंगत पिता के प्रति: सर्वेश्वरदयाल सक्सेना सूरज के साथ-साथ सन्ध्या के मंत्र डूब जाते थे, घंटी बजती थी अनाथ आश्रम में भूखे भटकते बच्चों के लौट आने की, दूर-दूर तक फैले खेतों पर, धुएँ में लिपटे गाँव पर, वर्षा से भीगी कच्ची डगर पर, जाने कैसा रहस्य भरा करुण अन्धकार फैल जाता था, और ऐसे में आवाज़ आती थी पिता तुम्हारे पुकारने की, मेरा नाम उस अंधियारे में बज उठता था, तुम्हारे स्वरों में। मैं अब भी हूँ अब भी है यह रोता हुआ अन्धकार चारों ओर लेकिन कहाँ है तुम्हारी आवाज़ जो मेरा नाम भरकर इसे अविकल स्वरों में बजा दे। धक्का देकर किसी को आगे जाना पाप है अत: तुम भीड़ से अलग हो गए। महत्वाकांक्षा ही सब दुखों का मूल है इसलिए तुम जहाँ थे वहीं बैठ गए। संतोष परम धन है मानकर तुमने सब कुछ लुट जाने दिया। पिता! इन मूल्यों ने तो तुम्हें अनाथ, निराश्रित और विपन्न ही बनाया, तुमसे नहीं, मुझसे कहती है, मृत्यु के समय तुम्हारे निस्तेज मुख पर पड़ती यह क्रूर दारूण छाया। सादगी से रहूँगा तुमने सोचा था अत: हर उत्सव में तुम द्वार पर खड़े रहे। झूठ नहीं बोलूँगा तुमने व्रत लिया था अत:हर गोष्ठी में तुम चित्र से जड़े रहे। तुमने जितना ही अपने को अर्थ दिया दूसरों ने उतना ही तुम्हें अर्थहीन समझा। कैसी विडम्बना है कि झूठ के इस मेले में सच्चे थे तुम अत:वैरागी से पड़े रहे। तुम्हारी अन्तिम यात्रा में वे नहीं आए जो तुम्हारी सेवाओं की सीढ़ियाँ लगाकर शहर की ऊँची इमारतों में बैठ ग थे, जिन्होंने तुम्हारी सादगी के सिक्कों से भरे बाजार भड़कीली दुकानें खोल रक्खी थीं; जो तुम्हारे सदाचार को अपने फर्म का इश्तहार बनाकर डुगडुगी के साथ शहर में बाँट रहे थे। पिता! तुम्हारी अन्तिम यात्रा में वे नहीं आए वे नहीं आए एहसानमन्द हूँ पिता: सविता सिंह एहसानमन्द हूँ पिता कि पढ़ाया-लिखाया मुझे इतना बना दिया किसी लायक कि जी सकूँ निर्भय इस संसार में झोंका नहीं जीवन की आग में जबरन बांधा नहीं किसी की रस्सी से कि उसके पास ताकत और पैसा था लड़ने के लिए जाने दिया मुझको घनघोर बारिश और तूफ़ान में एहसानमन्द हूँ कि इन्तज़ार नहीं किया मेरे जीतने और लौटने का मसरूफ़ रहे अपने दूसरे कामों में किससे पूछूँ, पापा!: दीनदयाल शर्मा पापा! मुझे बताओ बात कैसे बनते हैं दिन-रात, चंदा तारे दिखें रात को सुबह चले जाते चुपचाप। पापा! पेड़ नहीं चलते हैं ना ही करते कोई बात कैसे कट जाते हैं, पापा! इनके दिन और इनकी रात। और ढेर-सी बातें मुझको समझ क्यूँ नहीं आती हैं, ना घर में बतलाता कोई ना मैडम बतलाती हैं। फिर मैं किससे पूछूँ, पापा! मुझको बतलाएगा कौन डाँट-डपट के कर देते हैं मुझको, पापा! सारे मौन। पिता के बाद: रमेश प्रजापति कुछ दिन छत पर उतरे परिनदे गिलहारी की उदास पनियाली आँखें डबडबाती रही घर के सूनेपन में पेड़ से टपके गूलर सूखते रहे आँगन में माँ की सूनी कलाइयों में खनकता रहा चूड़ियों का खालीपन पिता के बाद छोटी बेटी की वीरान आँखें ढूँढती रही कँधों का झूला चाक से उतरकर आँगन में चहकती रही खिलौनों की खिलखिलाहट खाट के पास खड़ा हुक्का त्रसता पिता के बाद मुँडेर पर बैठी गौरैयाँ पुकारती रही पिता को आँगन में टहलती रही पिता की चिंतामग्न चहलकदमी पृथ्वी-सा टिका चाक अपनी घुरी पर एकटक निहारता रहा मुँह लटकाए ध्रुव तारे को चितकबरी गाय अपने नथुनों से सूंघती रही सानी में पिता की उँगलियों का स्पर्श पिता के बाद लचीला हो गया घर का कायदा-कानून कपूर-से उड़े मेरे बेवक्त घर लौटने के डर के बावजूद दौड़ता है मेरी रगों में पिता के उसूलों का रक्त जो बचाए रखता है आज भी मेरे अंदर पिता का होना

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