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पढ़िए रिया माथुर द्वारा एक और कविता जिसका टाइटल है "सिगरेट"


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Posted By : Sunil Rajak    2018-08-20  

Title- सिगरेट 

वो सिगरेट सा है तू जिसका नशा हर कश में बढ़ता जा रहा है,

याद जा नहीं रही और गुल गिरता जा रहा है।

सिगरेट को देख ये कह भी देती हूं,देख वो जुबान से लगाता था तुझे सुकुन बड़ा आता था उसे,

बस उसी सुकून की तलाश में तुझे जुबान से लगाती हूं,

आधी पीती हूं 

पूरी ख़तम हो जाती है 

तेरी यादों में हर कश थोड़ा लम्बा सा लगाती हूं।।

एक रोज सिगरेट खफा हो बैठी मुझसे,कहती है,

बहाना अपनी मेहबूब की यादों का लेकर तू मेरे इतने करीब आती है।

मैंने भी कह दिया,बस जानेमन ये देखने कैसे एक सौतन दूसरी सौतन का साथ निभाती है।

एक अरसा हुआ जुबान का हाल जाने,दूरियां कुछ बड़ सी गयी है,

शक तो मुझे तुझ पर है सिगरेट.........

क्यूंकि अक्सर उसके अकेलेपन का हिस्सा तू ही तो बन जाती है.......

सिगरेट पीना छोड़ दिया मैंने क्यूंकि अब अल्फाज़ो से तेरे एहसास की बू आती है...

क्यूंकि वो सिगरेट सा है तू,जिसका हर कश में थोड़ा लम्बा लगाती हूँ।।

लेखक-रिया माथुर शिवपुरी (मध्यप्रदेश)

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